श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 28
लखी मैं सखि! सुंदर श्यामल गात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhī maiṁ sakhi! sundara shyāmala gāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखी मैं सखि! सुंदर श्यामल गात।
2अलकनि कुटिल मनहुँ मुख-कमलनि, अवलिन-अलि चलि जात।
3कनकन मुकुट लकुटि वर कनकन, कनकन कंकन भात।
4कुंडल लोल सुगोल कपोलनि, करत कलोल लखात।
5दृग अंजन खंजन-मद-गंजन, जन-रंजन मदमात।
6मणिन-जटित कटि तट किंकिनि धुनि, हार मणिन बहुभाँत।
7पीतांबर परिधान काछनी, ता बिच वेनु सुहात।
8चलत चाल अलमस्त चंद्रिका, झुकि झुकि झोंके खात।
9मणि-मंडित मंजीर गुंजरति, ताहू पर मुसकात।
10कोटि अनंग “कृपालु” अंग प्रति, वारत हौं न अघात॥
हिन्दी भावार्थ
(श्री श्यामसुन्दर की शृंगार-माधुरी का वर्णन।) अरी सखि! मैंने सलोने श्यामसुन्दर को देखा है। उनकी घुंघरालं अलकें इस प्रकार शोभित हो रही हैं मानो उनके मुख रूपं क पर भौरों का झुंड एकत्र हो-होकर पंक्तिबद्ध हो रहा हो चे स्वर्ण के मुकुट एवं स्वर्ण की ही लकुटी तथा स्वर्ण के ह कंकण पहने हुए हैं। उनके सुन्दर गोल कपोलों पर हिलत हुआ चंचल कुण्डल खेल-सा रहा है। उनकी मतवाली आँख का अंजन रसिकों को आनंद देने वाला एवं खंजन पक्षी के म के मणियों के हार शोभित हो रहे हैं। वे पीताम्बर पहने हुए एवं उसके ऊपर काछनी काछे हुए हैं तथा उसके बीच में मुरली खोंसे हुए हैं। वे मतवाली चाल से चलते हैं अतएव मुकुट की मोर-चंद्रिका बार-बार झूमती हुई झोके ले रही है। उनके पैर में मणियों से युक्त नूपुर गुंजार कर रहा है। तिस पर भी उनका मुस्कराना तो बरबस मन को मोहित कर रहा है। कृपालु' कहते हैं कि हम तो उनके एक-एक अंग-पर करोड़ों कामदेवों को न्यौछावर करते हुए भी तृप्त नहीं होते।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 413-414