# लखी मैं सखि! सुंदर श्यामल गात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0416-M09-K028
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 28
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 196–196

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लखी मैं सखि! सुंदर श्यामल गात।  
<a id="line-2"></a>अलकनि कुटिल मनहुँ मुख-कमलनि, अवलिन-अलि चलि जात।  
<a id="line-3"></a>कनकन मुकुट लकुटि वर कनकन, कनकन कंकन भात।  
<a id="line-4"></a>कुंडल लोल सुगोल कपोलनि, करत कलोल लखात।  
<a id="line-5"></a>दृग अंजन खंजन-मद-गंजन, जन-रंजन मदमात।  
<a id="line-6"></a>मणिन-जटित कटि तट किंकिनि धुनि, हार मणिन बहुभाँत।  
<a id="line-7"></a>पीतांबर परिधान काछनी, ता बिच वेनु सुहात।  
<a id="line-8"></a>चलत चाल अलमस्त चंद्रिका, झुकि झुकि झोंके खात।  
<a id="line-9"></a>मणि-मंडित मंजीर गुंजरति, ताहू पर मुसकात।  
<a id="line-10"></a>कोटि अनंग “कृपालु” अंग प्रति, वारत हौं न अघात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्री श्यामसुन्दर की शृंगार-माधुरी का वर्णन।) अरी सखि! मैंने सलोने श्यामसुन्दर को देखा है। उनकी घुंघरालं अलकें इस प्रकार शोभित हो रही हैं मानो उनके मुख रूपं क पर भौरों का झुंड एकत्र हो-होकर पंक्तिबद्ध हो रहा हो चे स्वर्ण के मुकुट एवं स्वर्ण की ही लकुटी तथा स्वर्ण के ह कंकण पहने हुए हैं। उनके सुन्दर गोल कपोलों पर हिलत हुआ चंचल कुण्डल खेल-सा रहा है। उनकी मतवाली आँख का अंजन रसिकों को आनंद देने वाला एवं खंजन पक्षी के म के मणियों के हार शोभित हो रहे हैं। वे पीताम्बर पहने हुए एवं उसके ऊपर काछनी काछे हुए हैं तथा उसके बीच में मुरली खोंसे हुए हैं। वे मतवाली चाल से चलते हैं अतएव मुकुट की मोर-चंद्रिका बार-बार झूमती हुई झोके ले रही है। उनके पैर में मणियों से युक्त नूपुर गुंजार कर रहा है। तिस पर भी उनका मुस्कराना तो बरबस मन को मोहित कर रहा है। कृपालु' कहते हैं कि हम तो उनके एक-एक अंग-पर करोड़ों कामदेवों को न्यौछावर करते हुए भी तृप्त नहीं होते।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 413-414

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
