# लाल की अति मतवाली चाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0418-M09-K030
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 30
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 197–197

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लाल की अति मतवाली चाल।  
<a id="line-2"></a>चलत घूमि झुकि झूमि झूमि अति, लटपटात गोपाल।  
<a id="line-3"></a>मो कहँ जानि परत इनहिंन ते, सीखी चाल मराल।  
<a id="line-4"></a>पुनि इनहिंन ते सीखी उनहुँन, हस्तिन-चाल रसाल।  
<a id="line-5"></a>लखि सो चाल न घायल हो जो, नहिं त्रिभुवन अस बाल।  
<a id="line-6"></a>कहँ लौं कहिय “कृपालु” चाल ते, भोलेनाथ बेहाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर की चाल अत्यन्त ही मतवाली है। वे झुक-झुककर, झूम-झूमकर, घूम-घूमकर अत्यन्त लटपटाती हुई चाल से चलते हैं। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हीं से हंसों ने भी चलना सीखा है एवं इन्हीं से मतवाले हाथियों ने भी चलना सीखा है। त्रैलोक्य में ऐसी कोई सुन्दरी नहीं है जो कृपालु' कहते हैं कि उस चाल का वर्णन कहाँ तक करूँ साक्षात् भोलेनाथ भी उसे देखकर पागल हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 415

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
