# लाल के घूँघर वारे बाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0419-M09-K031
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 31
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 197–197

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लाल के घूँघर वारे बाल।  
<a id="line-2"></a>लगे उखारन कौरव पुरि जब, बल यमुनहिं हल डाल।  
<a id="line-3"></a>तब जैसी यमुनहिं भँवरिनि परि, तैसेहिं लट घुँघराल।  
<a id="line-4"></a>कबहुँक विहरत हरि-मुख ऊपर, कबहुँक विहरत भाल।  
<a id="line-5"></a>कबहुँक पियत अधर रस कबहुँक, चूमत नीले गाल।  
<a id="line-6"></a>जब “कृपालु” उड़ि परत दृगन महँ, टारत निज कर लाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर की लटें अत्यन्त घुँघराली हैं। जब बलराम न हस्तिनापुर को उखाड़ने के लिये यमुना के बीच में हल डाला था तब यमुना में जैसी भँवरियाँ पड़ी थीं, वैसी ही लटें पी घुँघराली हैं। ये घुँघराले बाल कभी तो श्यामसुन्दर के मुख क ऊपर विहार करते हैं एवं कभी ललाट के ऊपर विहार रते हैं। कभी श्यामसुन्दर के अधरामृत का पान करते हैं एवं भी नीले गाल को भी चूम लेते हैं। "कृपालु 'के शब्दों में ये जब अनधिकार चेष्टा करते हुए आँखों में उड़कर पड़ ते हैं तब श्यामसुन्दर इनको अपने कर कमल से हटाते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 415-416

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
