# वारी हौं, वारी छवि, पीतपट वारी पै।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0420-M09-K032
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 32
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 198–198

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>वारी हौं, वारी छवि, पीतपट वारी पै।  
<a id="line-2"></a>मणिन-जटित, कनक-मुकुट, लटनि-लटक कारी पै।  
<a id="line-3"></a>मुरलि-मधुर, मधुर-अधर, तान सुघर प्यारी पै।  
<a id="line-4"></a>मणिन-माल, मुक्त -माल, गुंजमालधारी पै।  
<a id="line-5"></a>नील-गाल, झलक-हलक, कुंडल छवि न्यारी पै।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” , अति रसाल, चालहिं गिरिधारी पै॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी वीर! मैं तो पीताम्बर वाली मनोहारी रूप धुरी पर वारी-वारी जाती हूँ। मणि मण्डित स्वर्ण के मुकुट वं घुंघराली लटों की लटक पर वारी-वारी जाती हूँ। सुन्दर धरों पर धरी मधुर मुरली की प्यारी तान पर वारी-वारी री जाती हूँ। नीले गालों पर हिलते हुए सुवर्ण के कुण्डल की लक पर वारी-वारी जाती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं-हम तो दलाल की अत्यन्त रसाल बाल मराल के समान मतवाली ल पर बलिहार जाते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 416

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
