श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 25
यमुन तट ठाढ़ो सुंदर श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yamuna taṭa, ṭhād̤ho sundara shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1यमुन तट ठाढ़ो सुंदर श्याम।
2मुकुट-ग्रीव-कटि-पद छवि बाँकी, अति बाँकी अभिराम।
3लकुटी कर लपटी पट दुपटी, लखि सिहात शत काम।
4कटि पट-पीत काछनी ता बिच, मुरली सुघर ललाम।
5चितवनि-चोट चलावत इत उत, मनभावत ब्रजभाम।
6छवि प्रतिबिंब “कृपालु” यमुन जल, लख इक सखि तेहि ठाम॥
हिन्दी भावार्थ
यमुना के किनारे श्यामसुन्दर खड़े हैं, उनके मुकुट ग्रीवा, कटि एवं पैर के टेढ़ेपन के सौन्दर्य की झाँकी अत्यन्त मनोहर है। उनके हाथ में दुपट्टे से लिपटी हुई लकुटि की शोभा को देख कर सैकड़ों कामदेव लज्जित हो रहे हैं। उनकी कमर में पीताम्बर एवं काछनी सुशोभित है। इस काछनी के बीच खोसी हुई मुरली अत्यन्त ही मनोहारिणी है। वे खड़े खड़े अपने कटाक्ष को इधर-उधर चलाते हुए ब्रजांगनाओं के मन को लुभा रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि लोक लज्जा के कारण घुँघट को उठा कर न देख सकने वाली एक नव विवाहिता सखि यमुना के तट पर बैठी हुई यमुना जल में पड़ती हुई श्यामसुन्दर की परछाई को देखकर आनन्द में विभोर हो रही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 410