श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 26
रसिकवर नागर नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rasikavara nāgara nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रसिकवर नागर नंदकुमार।
2चंदन चर्चित नील कलेवर, रूप-सुधा-रस-सार।
3मणिन-जटित सिर कनक मुकुट पर, मोर पुच्छ रिझवार।
4अनियारे कारे घुँघरारे, कुंतल कुटिल सँवार।
5मणिमंडित मकराकृत कुंडल, गंडनि करत विहार।
6बाँकी भृकुटि बनी अति बाँकी, लजवत धनु जनु मार।
7गरल-सुधा-मदमइ दृग-चितवनि, मृदु मुसकनि मनहार।
8गोल कपोल नासिका बेसर, मुक्ताहल भल धार।
9पीतांबर फहरात भात तनु, घन-दामिनि अनुहार।
10गुंजमाल वनमाल अलंकृत, विविध मणिन उर हार।
11युग कर कंकन कटि तट किंकिनि, काछनि अति अरुणार।
12पद-नख-मणि-छवि-चंद्र-तिरस्कृत, मृदु नूपुर झनकार।
13चलित दृगंचल चंचल नैननि, मोहत सब ब्रजनार।
14रोम रोम लखि रूप-माधुरी, कोटि काम बलिहार।
15ताहू पै “कृपालु” मुरली धुनि, जरे लोन जनु डार॥
हिन्दी भावार्थ
नंदकुमार रसिकों के सिरमौर एवं प्रीत-रीति में पूर्ण निपुण हैं। उनके नीले शरीर में चन्दन लगा है एवं वे सुन्दरता रूपी अमृत के रस के सार स्वरूप हैं। उनके सिर पर मणि मंडित स्वर्ण का मुकुट शोभित हो रहा है एवं उसमें झुमता हुआ मोर का पंख लगा हुआ है। उनके बाल अत्यन्त ही घने काले एवं घुँघराले हैं। गालों पर मकर के समान मणि जटित कुंडल झूल रहा है गंडनर विहार कर रही है उनकी सुन्दर भौंहे अत्यन्त ही टेढ़ी हैं तथा कामदेव के धनुष को भी लज्जित करने वाली हैं। उनकी आँखों की चितवन में अमृत, विष एवं मदिरा भरी हुई है, तथा उनकी मधुर-मुस्कान बरबस मन को हर लेती है। उनके गाल अत्यन्त ही गोल तथा उसकी नासिका में सुन्दर बेसर एवं मुक्ताहल शोभित हो रहा है। उनके शरीर रूपी बादल में पीताम्बर बिजली के समान फहराता हुआ शोभित हो रहा है। उनके वक्षस्थल पर गुंजमाल, वनमाल एवं अनेक प्रकार के मणियों के हार शोभायमान हो रहे हैं। उनके रोनों हाथों में कंकण तथा कमर में किंकिण एवं लाल रंग की क्राछनी अलंकृत हो रही है। उनके चरणों के नखमणि के सौंदर्य से चन्द्रमा भी लजा रहा है तथा मधुर पायल की ध्वनि हो रही है। उनके चंचल नेत्रों के कटाक्ष से समस्त ब्रजगोपियाँ गोहित हो रही हैं उनके प्रत्येक रोम की सौन्दर्य माधुरी को रखकर करोड़ों कामदेव वार दिये जा सकते हैं। 'कृपालु ह हैं कि इस पर भी उनकी मधुर मुरली की ध्वनि तो और मी घायल कर देती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 411-412