श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 24
मेरे नैनों को नीलमणि भाय गयो रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mere nainoṁ ko nīlamaṇi bhāya gayo re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मेरे नैनों को नीलमणि भाय गयो रे।
2सरस रसीले नैन-सैन सोँ, प्रेम-सुधा-रस प्याय गयो रे।
3जेहि खोजत रह रंक आजु लौं, सोइ पारस-मणि पाय गयो रे।
4अगलो पिछलो भयेउ भलो सब, पगलो मोहिं बनाय गयो रे।
5अब सोइ रूप अनूप प्राणधन, तन मन प्राण समाय गयो रे।
6कह “कृपालु” जब विरह पाय तब, कहिहौ धोखा खाय गयो रे॥
हिन्दी भावार्थ
मेरी आँखें नीलमणि श्यामसुन्दर की रूप-माधुर में अनुरक्त हो गयीं। उन्होंने अपने सरस कटाक्षपात से ह प्रेमरस पिला दिया। जिस प्रेमानन्द निधि को अनादि काल रे मैं भिखारी बन कर खोज रहा था, उसी दिव्यानन्द पारस को पा गया। मेरे पिछले कर्म भी बन गये एवं भविष्य भी ब गया और वर्तमान में तो पागल ही बना दिया है। अब तो प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर का वही अनिर्वचनीय स्वरूप मेरे तन मन, प्राणों में समा गया है। रसिकों की भाषा में 'कृपालु' कहते हैं-''श्रीमानजी! अभी फूले-फूले घूम रहे हो, जब श्यामसुन्दर का वियोग मिलेगा तब कहोगे-'अरे! अनन्त जन्मों में पहली बार ही तो इतना बड़ा धोखा खाया है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 409-410