श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 23
बलि जाऊँ रसीले लाल की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bali jāuṁ rasīle lāla kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बलि जाऊँ रसीले लाल की।
2विलसत कटि पटपीत मनोहर, लोचन चपल विशाल की।
3उर वनमाल दुकूल अलंकृत, मणिमय मुक्तामाल की।
4पग नूपुर झनकार मधुर-मृदु, गवनि मत्त गज चाल की।
5रोम रोम ते चुवत सुधारस, रतिरस सरस रसाल की।
6निर्निमेष ह्वै लखु “कृपालु” छवि, ललित त्रिभंग गुपाल की॥
हिन्दी भावार्थ
मैं रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर की बलैया लेता हूँ उनके अधोपीत-वस्त्र एवं चंचल विशाल नेत्रों की बलैया लेता हूँ। वक्षस्थल पर धारण की हुई वनमाला एवं पीताम्बर तथा मणियुक्त मुक्तामालाओं की बलैया लेता हूँ। चरण की कोमल मधुर नूपुर की झनकार की एवं मतवाले हाथी सरीखी चाल की बलैया लेता हूँ। श्याम सुन्दर के रोम रोम से सरस प्रेम सुधा रस चू रहा है। 'कृपालु' कहते हैं कि उन तीन भाग से रेढ़े श्यामसुन्दर की रूपमाधुरी को देखकर देखने वाले निर्निमेष से (पलकों का न गिरना अर्थात् एकटक) रह गये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 408-409