# मेरे नैनों को नीलमणि भाय गयो रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0412-M09-K024
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 24
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 194–194

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मेरे नैनों को नीलमणि भाय गयो रे।  
<a id="line-2"></a>सरस रसीले नैन-सैन सोँ, प्रेम-सुधा-रस प्याय गयो रे।  
<a id="line-3"></a>जेहि खोजत रह रंक आजु लौं, सोइ पारस-मणि पाय गयो रे।  
<a id="line-4"></a>अगलो पिछलो भयेउ भलो सब, पगलो मोहिं बनाय गयो रे।  
<a id="line-5"></a>अब सोइ रूप अनूप प्राणधन, तन मन प्राण समाय गयो रे।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” जब विरह पाय तब, कहिहौ धोखा खाय गयो रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मेरी आँखें नीलमणि श्यामसुन्दर की रूप-माधुर में अनुरक्त हो गयीं। उन्होंने अपने सरस कटाक्षपात से ह प्रेमरस पिला दिया। जिस प्रेमानन्द निधि को अनादि काल रे मैं भिखारी बन कर खोज रहा था, उसी दिव्यानन्द पारस को पा गया। मेरे पिछले कर्म भी बन गये एवं भविष्य भी ब गया और वर्तमान में तो पागल ही बना दिया है। अब तो प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर का वही अनिर्वचनीय स्वरूप मेरे तन मन, प्राणों में समा गया है। रसिकों की भाषा में 'कृपालु' कहते हैं-''श्रीमानजी! अभी फूले-फूले घूम रहे हो, जब श्यामसुन्दर का वियोग मिलेगा तब कहोगे-'अरे! अनन्त जन्मों में पहली बार ही तो इतना बड़ा धोखा खाया है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 409-410

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
