# यमुन तट ठाढ़ो सुंदर श्याम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0413-M09-K025
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 25
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 194–194

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>यमुन तट ठाढ़ो सुंदर श्याम।  
<a id="line-2"></a>मुकुट-ग्रीव-कटि-पद छवि बाँकी, अति बाँकी अभिराम।  
<a id="line-3"></a>लकुटी कर लपटी पट दुपटी, लखि सिहात शत काम।  
<a id="line-4"></a>कटि पट-पीत काछनी ता बिच, मुरली सुघर ललाम।  
<a id="line-5"></a>चितवनि-चोट चलावत इत उत, मनभावत ब्रजभाम।  
<a id="line-6"></a>छवि प्रतिबिंब “कृपालु” यमुन जल, लख इक सखि तेहि ठाम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

यमुना के किनारे श्यामसुन्दर खड़े हैं, उनके मुकुट ग्रीवा, कटि एवं पैर के टेढ़ेपन के सौन्दर्य की झाँकी अत्यन्त मनोहर है। उनके हाथ में दुपट्टे से लिपटी हुई लकुटि की शोभा को देख कर सैकड़ों कामदेव लज्जित हो रहे हैं। उनकी कमर में पीताम्बर एवं काछनी सुशोभित है। इस काछनी के बीच खोसी हुई मुरली अत्यन्त ही मनोहारिणी है। वे खड़े खड़े अपने कटाक्ष को इधर-उधर चलाते हुए ब्रजांगनाओं के मन को लुभा रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि लोक लज्जा के कारण घुँघट को उठा कर न देख सकने वाली एक नव विवाहिता सखि यमुना के तट पर बैठी हुई यमुना जल में पड़ती हुई श्यामसुन्दर की परछाई को देखकर आनन्द में विभोर हो रही है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 410

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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