श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 41
मैया मैं तो पायो भल गुरु-ज्ञान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: maiyā maiṁ to pāyo bhala guru-gyāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मैया मैं तो पायो भल गुरु-ज्ञान।
2कालि गयों कालिंदी तट हौं, खेलन संग सखान।
3मुनि दुर्वासा ज्ञान दियो तहँ, दै वेदादि प्रमान।
4कह्यो मनुज तनु को माटी को, एक खिलौना जान।
5उपजत माटी ते माटी महँ, मिलत अंत सच मान।
6मैया कह,"यह हौंहूँ जानति, कहा कहन चह कान्ह।
7जो यह जान माय तो काहे, देति न माटी खान।
8मैया कह लाला! माटिहिं ते, उपजत तरुन लतान।
9जो खैहौ माटी तो निकसहिं, तरु नासा मुख कान।
10लाला कह अब कबहुँ न खइहौं, मनहुँ मनहिं डरपान।
11कह “कृपालु” हरि अब जनि सुनियो, बाबन के व्याख्यान॥
हिन्दी भावार्थ
छोटे से भोरे भारे श्यामसुन्दर ने एक दिन मैया से कहा मुझे तो बड़ा अच्छा गुर ज्ञान मिला है। कल मैं सखाओं के साथ यमुना के किनारे खेलने गया था, वहाँ दुर्वासा मुनि ने वेदादि का प्रमाण देते हुए यह ज्ञान दिया कि मनुष्य शरीर मिट्टी का एक खिलौना है, क्योंकि यह मिट्टी से उत्पन्न होता है एव अन्त में मिट्टी में ही मिल जाता है। मैया ने कहा-'कन्हैया, यह तो मैं भी जानती हूँ किन्तु तेरे कहने का अभिप्राय क्या है? कन्हैया ने कहा-यदि मैया तू जानती है तो मुझे मिट्टी क्यों नहीं खाने देती? मैया ने कहा-लाला सामने देख मिट्टी से ही सब लता, वृक्ष पैदा होते हैं, यदि तू मिट्टी खायेगा तो अनेकानेक वृक्ष कोई नाक से, कोई मुख से, कोई कान से निकल पड़ेंगे।'लाल ने कहा-यदि ऐसा है तो मैया। अब मैं कभी मिट्टी नहीं खाऊँगा। बाल लीलानुसार श्यामसुन्दर मानो डर गये। 'कृपालु' कहते हैं कि हे बालकृष्ण! अबकी बार तो तुमको मैया ने बचा दिया किन्तु अब कभी भी बाबा लोगों के व्याख्यान न सुनना।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 303-304