# मैया मैं तो पायो भल गुरु-ज्ञान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0309-M07-K041
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 41
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 143–144

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मैया मैं तो पायो भल गुरु-ज्ञान।  
<a id="line-2"></a>कालि गयों कालिंदी तट हौं, खेलन संग सखान।  
<a id="line-3"></a>मुनि दुर्वासा ज्ञान दियो तहँ, दै वेदादि प्रमान।  
<a id="line-4"></a>कह्यो मनुज तनु को माटी को, एक खिलौना जान।  
<a id="line-5"></a>उपजत माटी ते माटी महँ, मिलत अंत सच मान।  
<a id="line-6"></a>मैया कह,"यह हौंहूँ जानति, कहा कहन चह कान्ह।  
<a id="line-7"></a>जो यह जान माय तो काहे, देति न माटी खान।  
<a id="line-8"></a>मैया कह लाला! माटिहिं ते, उपजत तरुन लतान।  
<a id="line-9"></a>जो खैहौ माटी तो निकसहिं, तरु नासा मुख कान।  
<a id="line-10"></a>लाला कह अब कबहुँ न खइहौं, मनहुँ मनहिं डरपान।  
<a id="line-11"></a>कह “कृपालु” हरि अब जनि सुनियो, बाबन के व्याख्यान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

छोटे से भोरे भारे श्यामसुन्दर ने एक दिन मैया से कहा मुझे तो बड़ा अच्छा गुर ज्ञान मिला है। कल मैं सखाओं के साथ यमुना के किनारे खेलने गया था, वहाँ दुर्वासा मुनि ने वेदादि का प्रमाण देते हुए यह ज्ञान दिया कि मनुष्य शरीर मिट्टी का एक खिलौना है, क्योंकि यह मिट्टी से उत्पन्न होता है एव अन्त में मिट्टी में ही मिल जाता है। मैया ने कहा-'कन्हैया, यह तो मैं भी जानती हूँ किन्तु तेरे कहने का अभिप्राय क्या है? कन्हैया ने कहा-यदि मैया तू जानती है तो मुझे मिट्टी क्यों नहीं खाने देती? मैया ने कहा-लाला सामने देख मिट्टी से ही सब लता, वृक्ष पैदा होते हैं, यदि तू मिट्टी खायेगा तो अनेकानेक वृक्ष कोई नाक से, कोई मुख से, कोई कान से निकल पड़ेंगे।'लाल ने कहा-यदि ऐसा है तो मैया। अब मैं कभी मिट्टी नहीं खाऊँगा। बाल लीलानुसार श्यामसुन्दर मानो डर गये। 'कृपालु' कहते हैं कि हे बालकृष्ण! अबकी बार तो तुमको मैया ने बचा दिया किन्तु अब कभी भी बाबा लोगों के व्याख्यान न सुनना।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 303-304

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
