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श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 23

नवनि हित झगरत दोउ सुखधाम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: navani hita jhagarata dou sukhadhāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1नवनि हित झगरत दोउ सुखधाम।

2ग्रीवा पकरि महरि को दोउ कर, बिरुझाने इत श्याम।

3खींचत पकरि यशोमति चोटी, पाछे ते बलराम।

4इक कर हरि, इक कर हलधर कहँ, पकरति लै लै नाम।

5अबहिं दोउ खाउगे साँटी, करन देत नहिं काम।

6जब लौं मथति दही तब लौं दोउ, खेलि आउ कहुँ गाम।

7कह “कृपालु” हरि बिनुहिं मथे दे, नवनि, हँसति ब्रजबाम॥

हिन्दी भावार्थ

मक्खन के लिए बालकृष्ण एवं बलराम मैया से झगड़ रहे हैं। आगे से श्यामसुन्दर मैया की ग्रीवा पकड़ कर झूलते हुए मचल रहे हैं एवं पीछे से बलराम यशोदा मैया की चोटी पकड़ कर खींच रहे हैं। मैया ने एक हाथ से श्यामसुन्दर को एवं दूसरे हाथ से बलराम को पकड़ कर दोनों का नाम लेते हुए कहा कि तुम दोनों मुझे काम नहीं करने देते, अभी डंडा खाओगे। जब तक मैं दही नहीं मथ लेती, तब तक तुम दोनों गाँव में जा कर कुछ देर खेल आओ। यह सुनकर बलराम तो चल दिये किन्तु 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर ने भोलेपन में मैया से कहा कि मैया! मुझे तो तू बिना दही मथे ही मक्खन दे दे। श्यामसुन्दर के भोलेपन पर पास ही बैठी हुई ब्रजांगनाएँ आनन्द विभोर होकर हँसने लगीं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 285-286