श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 22
उठे हरि नैनन नींद भरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: uṭhe hari, nainana nīṁda bhare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1उठे हरि नैनन नींद भरे।
2अति-रस भरे नैन रतनारे, डोरन अरुन परे।
3खंजन मीन चकोर ठगे से, देखत नैन खरे।
4खुलत न नैन मैन मदमाते, जनु असि म्यान धरे।
5श्यामगात जँभुवात मूँदि दृग, मातु स्वकर पकरे।
6डगमगात पग धरत धरणि पर, बिच बिच दृग उघरे।
7लखतहिं बनत “कृपालु” लाल छवि, बरबस स्ववस करे॥
हिन्दी भावार्थ
नन्दनन्दन प्रातः काल आँखों में नींद भरे हुए, जगाने पर किसी प्रकार उठे। गुलाबी रंग के उनके नेत्र अत्यन्त रसीले थे, उनमें लाल डोरे पड़े हुए थे। उनके नेत्रों को खंजन पक्षी मछली एवं चकोर आदि ठगे से खड़े होकर आश्चर्य भर दृष्टि से देख रहे हैं। मदभरी आँखें किसी प्रकार नहीं खुलतीं ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई तलवार म्यान में रखी हो श्यामसुन्दर आँखें बंद किये हुए ही जँभुआ रहे हैं और मैय अपने हाथ से पकड़े हुए है। वे डगमगाते हुए पृथ्वी पर पै रखते हैं। बीच-बीच में आँखें भी खोलते जाते हैं। "कृपालु के शब्दों में श्यामसुन्दर की यह अलसानी झाँकी सभी क हठात् विभोर कर रही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 285