श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 21
मेरे नैनन तारे जाग रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mere nainana tāre jāga re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मेरे नैनन तारे जाग रे।
2भई भोर चहुँ ओर शोर सुन, बोलत शुक पिक काग रे।
3शीतल-मंद-सुगंध पवन बह, चकई पाइ सुहाग रे।
4आई भानु-किरन लखु मोहन, चंद्र-किरन गई भाग रे।
5उदित-भानु लखि विकसित कमलनि, भ्रमरन पियत पराग रे।
6दोउ कर परसि “कृपालु” मातु मुख, चूमति अति अनुराग रे॥
हिन्दी भावार्थ
सोते हुए श्यामसुन्दर को जगाती हुई मैया कहती है कि हे मेरे आँखों के तारे श्यामसुन्दर! जागो। देखो तो सवेरा हो गया। चारों ओर तोते, कोयल एवं कौवे शोर कर रहे हैं। शीतल, मंद, सुगन्धित वायु बह रही है। रात भर की बिछुड़ी हुई चकई, चकवे से मिल रही है। सूर्य की किरणें फैल रही हैं। चन्द्रमा की किरणें समाप्त हो रही हैं। सूर्योदय होने से खिले हुए कमलों पर गुंजार करते हुए भौंरे पराग-रस पी रहे हैं। 'कृपालु' के शब्दों में मैया इस प्रकार कहती हुई प्रेम विभोर हो कर अपने दोनों हाथों से श्यामसुन्दर का मुख स्पर्श कर चूमकर बार-बार बलिहार जा रही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 284