श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 20
चलन लागे गिरत परत गोपाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalana lāge, girata parata gopāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चलन लागे गिरत परत गोपाल।
2पकरि महरि यशुमति कर अँगुरिन, ठड़े होत नँदलाल।
3नट उनमानि साधि तनु अपनो, किलकत यशुमति बाल।
4इक पग चलत गिरत पुनि भू पर, उठत तुरत पुनि लाल।
5पुनि पुनि गिरत उठत तब खीझत, चलत घुटुरुवनि चाल।
6धनि “कृपालु” सो नंद यशोमति, जो लखि होत निहाल॥
हिन्दी भावार्थ
श्री श्यामसुन्दर गिरते पड़ते किसी प्रकार चल रहे हैं। यशोदा मैया के हाथों की अँगुलियों को पकड़ कर किसी प्रकार खड़े होते हैं। नट के समान अपने शरीर को साधकर किलकारी मारते हैं। किसी प्रकार एक कदम चलते हैं, पुनः पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं फिर तुरन्त ही उठते हैं। इस प्रकार बार-बार गिरने उठने से खीझ जाते हैं, तब पुराने अभ्यास के अनुसार घुटने के बल चलते हैं। 'कृपालु' के शब्दों में उन नन्द यशोमति के धन्य भाग्य हैं जो ब्रह्म की बाल लीला को देखकर विभोर होते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 283-284