श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 14
अजिर महँ विहर ब्रह्म साकार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ajira mahaṁ bihara ‘brahma sākāra’
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अजिर महँ विहर ब्रह्म साकार।
2घुटुवनि चलत नवनि मुख मंडित, दीठि दिठौना धार।
3कबहुँक चलत मंदगति कबहुँक, द्रुत चल करि किलकार।
4कबहुँक लखि दूरहिं ते माटी, दौरि लेत मुख डार।
5जो यशुमति मुख-माटि निकारत, लोटत धरणि मझार।
6लै “कृपालु” निज अंक यशोमति, चूमति करति दुलार॥
हिन्दी भावार्थ
यशोदा के आँगन में सगुण साकार ब्रह्म नंदलाल बनकर खेल रहे हैं। वे यशोदा के लाल, मुख में मक्खन लगाये हुए, टोना से बचने के लिए ललाट में काला टीका लगाये हुए, घुटनों के बल चल रहे हैं। कभी घुटनों के बल बड़ी मस्ती से बालकृष्ण धीरे-धीरे चलते हैं और कभी किलकारी मारकर अत्यन्त तेज चलने लगते हैं। कभी दूर से ही कहीं पड़ी हुई मिट्टी को देखकर जल्दी से वहाँ जाकर, उसे अपने मुख में डालकर खाने लगते हैं। जब यशोदा मैया मिट्टी खाते हुए देख लेती हैं तथा मुख से मिट्टी निकाल देती हैं, तब पृथ्वी पर लोटने लगते हैं, मानो उनका सर्वस्व छिन गया हो। 'कृपालु' कहते हैं कि उन लोटते हुए गोपाल को यशोदा अपनी गोद में ले-लेकर अनेक प्रकार से लाड़ करती हैं, एवं बार-बार मुख चूमती हैं ताकि वे चुप हो जायें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 279