श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 15
खंभ-मणि विहरत सुंदर श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: khambha-maṇi, biharata sundara shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1खंभ-मणि विहरत सुंदर श्याम।
2लखि प्रतिबिंब खंभ-मणि छिन-छिन, किलकत अति अभिराम।
3कबहुँ दिखावत दशन मगन मन, रसनहिं कबहुँ ललाम।
4कबहुँ दिखावत निज कर अँगुरिन,"गूँ गूँ"करि सुखधाम।
5कबहुँक खीझि मार कर ते हरि, कबहुँक मारत पाम।
6इमि “कृपालु” रीझत खीझत हरि, रिझवत यशुमति भाम॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर मणिमण्डित खंभ के पास विहार कर रहे हैं। वे उन मणिमण्डित खंभों में अपनी परछाई देखकर बार-बार मधुर किलकारी मारते हैं। कभी तो अपनी ही परछाई को, दूसरा बालक समझकर, आनन्द में विभोर होकर, अपने दाँत दिखाते हुए चिढ़ते हैं। कभी इसी प्रकार जिह्वा दिखाते हैं। कभी 'गूँ गूँ' ऐसी मधुर ध्वनि करते हुए हाथों की अंगुलियाँ दिखाते हैं एवं कभी अपने ही समान सभी संकेत करते हुए देख कर, मणिखम्भ में हाथ से मारते हैं तथा कभी पैर से भी मारते हैं। 'कृपालु' के मतानुसार इस प्रकार रीझते-खीझते हुए, बड़भागिनी यशोदा मैया को रिझा रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 279-280