# अजिर महँ विहर ब्रह्म साकार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0282-M07-K014
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 14
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 130–131

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अजिर महँ विहर ब्रह्म साकार।  
<a id="line-2"></a>घुटुवनि चलत नवनि मुख मंडित, दीठि दिठौना धार।  
<a id="line-3"></a>कबहुँक चलत मंदगति कबहुँक, द्रुत चल करि किलकार।  
<a id="line-4"></a>कबहुँक लखि दूरहिं ते माटी, दौरि लेत मुख डार।  
<a id="line-5"></a>जो यशुमति मुख-माटि निकारत, लोटत धरणि मझार।  
<a id="line-6"></a>लै “कृपालु” निज अंक यशोमति, चूमति करति दुलार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

यशोदा के आँगन में सगुण साकार ब्रह्म नंदलाल बनकर खेल रहे हैं। वे यशोदा के लाल, मुख में मक्खन लगाये हुए, टोना से बचने के लिए ललाट में काला टीका लगाये हुए, घुटनों के बल चल रहे हैं। कभी घुटनों के बल बड़ी मस्ती से बालकृष्ण धीरे-धीरे चलते हैं और कभी किलकारी मारकर अत्यन्त तेज चलने लगते हैं। कभी दूर से ही कहीं पड़ी हुई मिट्टी को देखकर जल्दी से वहाँ जाकर, उसे अपने मुख में डालकर खाने लगते हैं। जब यशोदा मैया मिट्टी खाते हुए देख लेती हैं तथा मुख से मिट्टी निकाल देती हैं, तब पृथ्वी पर लोटने लगते हैं, मानो उनका सर्वस्व छिन गया हो। 'कृपालु' कहते हैं कि उन लोटते हुए गोपाल को यशोदा अपनी गोद में ले-लेकर अनेक प्रकार से लाड़ करती हैं, एवं बार-बार मुख चूमती हैं ताकि वे चुप हो जायें।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 279

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
