दैन्य-माधुरी · पद 85
श्याम मोहिं देहु प्रेम निष्काम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma mohiṁ dehu prema nishkāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम मोहिं देहु प्रेम निष्काम।
2इंद्रहुँ संपति लहि इन इंद्रिन, मिटत न कैसेहुँ काम।
3मन अति चपल चपलताहूँ ते, चलत रहत बसुयाम।
4हौं हार्यो समुझाय विविध विधि, नहिं मानत गति बाम।
5रसिकन कही मानि अब तुम्हरी, शरण गही घनश्याम।
6ब्रज रस देहु पिलाय"कृपालुहिं", भटकत थकि गये पाम॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! मैं एकमात्र निष्काम प्रेम ही चाहता हूँ। इन इन्द्रियों की कामनाएं तो देवराज इन्द्र की सम्पत्ति मिलने पर भी नहीं समाप्त हो सकतीं। मन चंचलता से भी अधिक चंचल है। यह एक क्षण को भी चुप नहीं बैठ सकता। मैं इसे अनेक प्रकार से समझा कर हार गया, किन्तु यह उल्टी चाल से ही चलता है। अब मैंने रसिकों की आज्ञा मानकर एकमात्र तुम्हारी शरण ग्रहण कर ली है। इसलिए इस 'कृपालु को अब ब्रजरस पिला दो। मायिक जगत में भटकते-भटकते हमारे पैर थक गये हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 241