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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 84

श्याम तुम कैसे हो घनश्याम?।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma tuma kaise ho ghanashyāma?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्याम तुम कैसे हो घनश्याम?।

2इक घनश्यामहिं लखत कृषक जन, बनत न तिन कछु काम।

3तरसत कृषक न बरसत सो घन, जल भरि उर अभिराम।

4इक घनश्याम बरसि कृषकन मन, हरषावत तेहि ठाम।

5सब जानत घनश्याम तिहारो, रसिक शिरोमणि नाम।

6दो “कृपालु” बरसाय प्रेम रस, पियत रहौं वसु याम॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुमने झूठमूठ को ही अपना नाम घनश्याम रख छोड़ा है। एक घनश्याम (काले बादल) को किसान लोग टकटकी लगाये रहते हैं किन्तु उससे किसी का काम नहीं बनता क्योंकि वह बादल, अपने अन्दर पानी भरे हुए भी नहीं बरसता, किसान तरसते रहते हैं। दूसरे प्रकार का घनश्याम (काला बादल) वह है जो पानी बरसाकर किसानों को आनन्दित करता है। हे, श्यामसुन्दर! सब जानते हैं कि तुम्हार नाम रसिक शिरोमणि है फिर कृपणता क्यों कर रहे हो। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रेम रस की वर्षा कर दो जिसे हम निरन्तर पीते रहें।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 240-241