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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 83

श्याम तुम कैसे दीन दयाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma tuma kaise dīnadayāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्याम तुम कैसे दीन दयाल।

2सब कह तुम बिनु हेतु सनेही, विश्वंभर प्रतिपाल।

3बेर भई टेरत मोहिं पुनि क्यों, कृपण भये नंदलाल।

4टुक चंदन के तिलक लगाये, कुबरिहिं किये निहाल।

5केतिक नाम गिनाऊँ जिन कहँ, प्रेम दिये गोपाल।

6कारण कौन"कृपालुहिं"त्याग्यो, कारण रहित कृपाल॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुमने झूठ-मूठ ही अपना नाम दीनदयालु रख छोड़ा है। सब लोग तुम्हें अकारण-करुण एवं विश्वम्भर कहते हैं। मैं कितनी देर से पुकार रहा हूँ फिर भी तुम नहीं सुनते। क्या अब कृपण हो गये हो? जरा सा चन्दन लगाने मात्र से तुमने कुब्जा को कृतार्थ कर दिया। कुब्जा ही नहीं अगणित जीवों को इसी प्रकार प्रेमदान किया। 'कृपालु' कहते हैं कि हे अकारण करुण! फिर क्या कारण है कि मुझे छोड़ रखा है?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 240