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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 86

श्याम है झूठो तुम्हरो नाम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma hai jhūṭho tumharo nāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्याम है झूठो तुम्हरो नाम।

2नाम पतित-पावन लै बैठ्यो, करत न पतितन काम।

3तुम कहँ कौन लाज तुम कहिहौ, श्रुति कह मोहिं अकाम।

4पै तुम्हरे जन को अपयश तुम, कैसे सुनिहौ श्याम।

5हम नहिं माँगत भुक्ति मुक्ति कछु, देहु कमल पद ठाम।

6कहा “कृपालु” जाय घटि तुम्हरो, करहु कृपा सुखधाम॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर। तुम्हारे सभी नाम निरर्थक हैं। तुम्हारा एक नाम पतितपावन है, किन्तु फिर भी मुझको पवित्र नहीं किया। तुम कहोगे कि मैं तो काम रहित हूँ ऐसा वेद कहता है किन्तु तुम्हारे भक्तों का अपयश तुम कैसे सहन करोगे? क्योंकि तुम्हारे भक्त ही तुम्हें पतित-पावन कहते हैं। हम भुक्ति-मुक्ति आदि नहीं माँगते। हम तो तुम्हारे चरण-कमलों में ही स्थान चाहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं-तुम्हारे भंडार में क्या कमी हो जायगी? कृपा-कटाक्ष की ही तो बात है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 242