दैन्य-माधुरी · पद 44
दयामय! दया चहौं नहिं न्याय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dayāmaya! dayā chahauṁ nahiṁ nyāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दयामय! दया चहौं नहिं न्याय।
2नहिं पैहौ प्रभु! पार न्याय करि, एतिक मम अन्याय।
3बिनु जाने अपराध करत जो, सोऊ दंडहिं पाय।
4पुनि जो जानि जानि कर पापन, नाथ! कौन गति वाय।
5न्याय होत जगहूँ, पै तुम तो, करुणाकर कहलाय।
6कहत “कृपालु” न चतुराइहिं कछु, देखहु उर पुर आय॥
हिन्दी भावार्थ
हे दयासिन्धु श्यामसुन्दर! मैं दया चाहता हूँ, न्याय हीं चाहता। हे प्रभो। यदि न्याय करोगे तो मेरे अगणित पापों की गणना भी न कर सकोगे। जब अनजाने में ही अपराध करने पर आपके यहाँ दण्ड अवश्य भोगना पड़ता है तब फिर जो जान-जान कर पाप करता है, हे नाथ! उसकी क्या गति होगी। न्याय तो संसार में यथाशक्ति होता ही है, किन्तु तुम तो अकारण-करुण हो इसका ख्याल करो। 'कृपालु' कहते हैं के मैं कुछ चतुराई से नहीं कह रहा हूँ, मेरे हृदय में झाँक कर ख लो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 208