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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 45

दयामय! मोहिं समान मोहिं जान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dayāmaya! mohiṁ samāna mohiṁ jāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1दयामय! मोहिं समान मोहिं जान।

2ज्यों तुम सम तुम ही बिनु कारन, करुनाकर भगवान।

3त्यों हम सम हम ही बिनु कारण, करत न अघन अघान।

4जग महँ इक उत्तम नर जो उर, सपनेहुँ अघन न आन।

5सो मध्यम नर अघ करि जो कर, प्रायश्चित्त महान।

6हौं “कृपालु” अति ही निकृष्ट पै, जग तुम्हरो जन जान॥

हिन्दी भावार्थ

हें दया के सागर श्यामसुन्दर! मेरे समान निकृष्ट गे ही हूँ। जिस प्रकार तुम्हारे समान बिना कारण के ही करुण करने वाले तुम ही हो, उसी प्रकार मेरे समान भी बिना कारण ही अपराध करने वाला मैं ही हूँ। संसार में उत्तम पुरुष वे लोर हैं जो स्वप्न में भी अपराध नहीं करते, दूसरे मध्यम वे लोग है जो अकस्मात् अपराध हो जाने पर महान् पश्चात्ताप करते हैं क कृपालु' कहते हैं कि मैं तो अत्यन्त ही निकृष्ट हूँ जो अपराध को भी अपराध नहीं मानता। फिर भी भोला-भाला संसार मुझे तुम्हारा भक्त समझता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 208-209