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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 43

दयामय! अब तो दया करो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dayāmaya! aba to dayā karo

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1दयामय! अब तो दया करो।

2बानि अकारन-करुन जानि निज, अवगुन चित न धरो।

3हम अयान मन-बुधि-अतीत पुनि, तुम अरु जन तुम्हरो।

4याते संतन कह्यो न मानत, उर अभिमान खरो।

5सुन्यो कान अभिमान अशन तव, पुनि काहे जु डरो।

6देहु"कृपालुहिं"चरण कमल रति, जात त्रिताप जरो॥

हिन्दी भावार्थ

हे दयामय! अब तो मेरे ऊपर कृपा कीजिए आपका विरद है कि मैं बिना कारण ही कृपा करता हूँ। हमारे अवगुणों को अपने हृदय में न रखिये। हम अबोध हैं किन्तु तुम एवं तुम्हारे जन दोनों ही मन-बुद्धि से परे हैं, इसी से हम सन्तों को कही हुई बातों को भी नहीं मान पाते। हम इनको पहचानने में भी तो असमर्थ हैं। हृदय में अत्यन्त अभिमान होने के कारण हम महापुरुषों का भी अपमान कर देते हैं। रसिकों के मुख से सुना है कि अभिमान तुम्हारा भोजन है। यदि यह सच है तो फिर मेरे अभिमान से क्यों डर रहे हो। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं अब तीनों प्रकार के तापों में अत्यन्त जला जा रहा हूँ अतएव मुझे अपने चरण-कमलों का प्रेम देकर कृतार्थ कीजिये।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 207