दैन्य-माधुरी · पद 42
दयामय! अपनो विरद विचार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dayāmaya! apano virada vichāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दयामय! अपनो विरद विचार।
2वेद पुरान बखान अकारन, करुनाकर सरकार।
3पुनि तोहिं लगत पतित अति प्यारो, अस कह रसिक पुकार।
4हौं अति पतित रहित साधन पुनि, पुनि मतिमंद गमार।
5यह बड़ सोच, जान जग मो कहँ, तुम्हरोइ नंदकुमार।
6लाज बचाउ “कृपालु” आपुनिहिं, अपनो जानि निहार॥
हिन्दी भावार्थ
हे दयालु श्यामसुन्दर! तुम अपने विरद पर विचार करो। सरकार को वेदों-पुराणों में बिना कारण के ही कृपा करने वाला बतलाया है। फिर तुम्हारे संतों ने भी पुकार-पुकार कर यह कहा है कि तुम पतितों से अत्यधिक प्यार करते हो। मैं तो अत्यधिक पतित हूँ, फिर साधनहीन हूँ, फिर बुद्धिहीन भी हूँ। ह सब से बड़ी चिन्ता यही है कि संसार मुझे तुम्हारा भक्त समझता है। 'कृपालु' कहते हैं-अतएव अपनी लज्जा की रक्षा करो, एवं मुझे अपना जानकर एक बार निहार दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 206-207