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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 41

दयामय! अपनी ओर निहारो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dayāmaya! apanī ora nihāro

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1दयामय! अपनी ओर निहारो।

2हौं तो कुटिल कुपूत सदा को, तुम निज विरद विचारो।

3शिला अहिल्या, पशु वानर, गुह, श्वपच आदि उर धारो।

4मम हिय कुलिश, पतितमति पशु ते, कर्म श्वपच शत वारो।

5इक गुन रीझत गुनगाहक! इन, हमरे गुनन पसारो।

6जो कह साधन-बल मम पद गहु, नहिं त्रिकाल निस्तारो।

7हम “कृपालु” उन प्रभु को चेरो, जो बिनु हेतु हमारो॥

हिन्दी भावार्थ

हे दयामय श्यामसुन्दर! हम तो अनादि काल के ही नीच एवं कुपुत्र हैं, पर आपको अपनी ओर देखना चाहिए। क्योंकि तुम्हारा विरद पतितपावन, अर्थात् पतितों को पवित्र करने वाला है। मैंने सुना है कि अहिल्या पत्थर थी, वानरगण पशु थे, गुह चाण्डाल था, उन सबको आपने अपने हृदय में सथान दिया है। अभिप्राय यह है कि आपको पत्थर, पशु और चाण्डाल अतिप्रिय हैं, फिर मेरे पास तो यह तीनों ही वस्तु प्रचुर मात्रा में हैं। उदाहरणार्थ मेरा हृदय वज्र के समान (जो पत्थर से भी कठोर होता है), मेरी बुद्धि पशुओं से भी गिरी हुई एवं मेरे कार्य सैकड़ों चाण्डालों के समान हैं। गुणग्राहक श्यामसुन्दर! तुम जब उपर्युक्त एक ही गुण से रीझ गये थे, तब तो तुम्हें रिझाने के लिए हमारे पास कई गुण हैं। अगर तुम कहो कि 'साधन-बल से हमारे चरण-कमलों तक आ जाओ तब तो तीनों काल में हमारा निस्तार नहीं हो सकता। "कृपालु हते हैं कि हम तो उन दयामय प्रभु के दास हैं, जो बिना पाधन आदि के कारण के ही हमारे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 205-206