# दयामय! अपनी ओर निहारो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0192-M04-K041
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 41
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 87–87

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>दयामय! अपनी ओर निहारो।  
<a id="line-2"></a>हौं तो कुटिल कुपूत सदा को, तुम निज विरद विचारो।  
<a id="line-3"></a>शिला अहिल्या, पशु वानर, गुह, श्वपच आदि उर धारो।  
<a id="line-4"></a>मम हिय कुलिश, पतितमति पशु ते, कर्म श्वपच शत वारो।  
<a id="line-5"></a>इक गुन रीझत गुनगाहक! इन, हमरे गुनन पसारो।  
<a id="line-6"></a>जो कह साधन-बल मम पद गहु, नहिं त्रिकाल निस्तारो।  
<a id="line-7"></a>हम “कृपालु” उन प्रभु को चेरो, जो बिनु हेतु हमारो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे दयामय श्यामसुन्दर! हम तो अनादि काल के ही नीच एवं कुपुत्र हैं, पर आपको अपनी ओर देखना चाहिए। क्योंकि तुम्हारा विरद पतितपावन, अर्थात् पतितों को पवित्र करने वाला है। मैंने सुना है कि अहिल्या पत्थर थी, वानरगण पशु थे, गुह चाण्डाल था, उन सबको आपने अपने हृदय में सथान दिया है। अभिप्राय यह है कि आपको पत्थर, पशु और चाण्डाल अतिप्रिय हैं, फिर मेरे पास तो यह तीनों ही वस्तु प्रचुर मात्रा में हैं। उदाहरणार्थ मेरा हृदय वज्र के समान (जो पत्थर से भी कठोर होता है), मेरी बुद्धि पशुओं से भी गिरी हुई एवं मेरे कार्य सैकड़ों चाण्डालों के समान हैं। गुणग्राहक श्यामसुन्दर! तुम जब उपर्युक्त एक ही गुण से रीझ गये थे, तब तो तुम्हें रिझाने के लिए हमारे पास कई गुण हैं। अगर तुम कहो कि 'साधन-बल से हमारे चरण-कमलों तक आ जाओ तब तो तीनों काल में हमारा निस्तार नहीं हो सकता। "कृपालु हते हैं कि हम तो उन दयामय प्रभु के दास हैं, जो बिना पाधन आदि के कारण के ही हमारे हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 205-206

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
