दैन्य-माधुरी · पद 40
तुमहिं मम गति गिरिधर गोपाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tumahi mama, gati giridhara gopāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तुमहिं मम गति गिरिधर गोपाल।
2कोउ धन साधन बल जग महँ कर, यज्ञ अनेक विशाल।
3कोउ कानन महँ करत घोर तप, तजि जल अशन रसाल।
4कोउ अष्टांग योग-साधन कोउ, अनुष्ठान विकराल।
5सुन्यों नाथ हौं परम आलसी, तुम पतितन-प्रतिपाल।
6तजि “कृपालु” विश्वास आस सब, भजत लाड़लिहिं लाल॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम ही मेरे सर्वस्व हो। संसार में कोई धनादि के साधनों द्वारा अनेक महत्तम यज्ञ करता है। कोई खाना-पीना छोड़ कर घोर जंगल में तप करता है। कोई अष्टांग योग-साधन करता है। कोई दुष्कर अनुष्ठान करता है। किन्तु हे नाथ! मैं तो महा आलसी हूँ, मैंने तो सुना है कि तुम पतितों को अपनाते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो और सब आशाओं एवं विशवासों को छोड़कर एकमात्र श्यामा-श्याम की उपासना करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 205