दैन्य-माधुरी · पद 37
कुँवरि! हौं, मानत हौं निज दोस।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari! hauṁ, mānata hauṁ nija dosa
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि! हौं, मानत हौं निज दोस।
2जूते लात खातहूँ निशिदिन, इंद्रिन करत भरोस।
3पुनि-पुनि विषय देत इनहिंन कहँ, करत न सपनेहुँ रोस।
4ब्रह्मलोक पर्यंत भोग लहि, होत नाहिं संतोस।
5यह जानतहूँ नहिं मानत हौं, भरत अघन को कोस।
6लखि “कृपालु” निज ओर करहु अब, कृपा कुमारी-घोस॥
हिन्दी भावार्थ
हे किशोरी जी! मैं अपना सब दोष मानता हूँ। इन इन्द्रियों के छिन छिन जूते लात खाने पर भी इन्हीं का भरोसा करता हूँ एवं इनको बार-बार सांसारिक विषयों की सामग्री देता हूँ। कभी स्वप्न में भी इनके ऊपर क्रोध नहीं करता। यद्यपि यह जानता हूँ कि ब्रह्मलोक पर्यन्त के ऐश्वर्यों के विषय भोग देने पर भी तृप्ति नहीं हो सकती, फिर भी नहीं मानता एवं पापों का भंडार भरता रहता हूँ। अतएव हे घोष कुमारी राधिके! तुम अपनी ओर देखकर ही मेरे ऊपर कृपा कर दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 203