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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 36

किशोरी मोरी, सुनिय नेकु इक बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī morī, suniya neku ika bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1किशोरी मोरी, सुनिय नेकु इक बात।

2हौं मानत हौं परम पातकी, विश्व-विदित विख्यात।

3पै यह कौन बात अचरज की, तव चरनन विलगात।

4कोउ इक मोहिं बताउ तुमहिं तजि, बिनु पातक जग जात।

5जेहि दरबार कृपा बिनु कारन, बटत रही दिन रात।

6तेहि दरबार भयो अब टोटो, यह अचरज दरसात।

7मोहिं “कृपालु” कछु आपुन सोच न, तोहिं सोचि पछितात॥

हिन्दी भावार्थ

हे वृन्दावन विहारिणी राधिके! मैं आपसे एक छोटी सी बात कहना चाहता हूँ, कृपया बुरा न मानते हुए सुन लीजिए। मैं स्वयं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैं समस्त संसार में प्रख्यात एवं सर्वश्रेष्ठ पापात्मा हूँ, पर साथ ही यह भी कहना चाहता हूँ कि तुम्हारे चरण-कमलों से विमुख होने के कारण हूँ इसमें आश्चर्य हीं क्या है? अनादि काल से लेकर आज तक के इतिहास में मुझे किसी एक जीव का भी नाम बता दीजिए जो तुमसे विमुख हीकर भी बिना पाप के संसार में हुआ हो। आश्चर्य तो यह है कि जिस दरबार में बिना कारण ही निरन्तर कृपा का वितरण हुआ करता था, आज उसी दरबार में मुझ पतित के लिए कृपणता की जा रही है। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे अपनी तो कोई भी चिंता नहीं, किन्तु तुम्हारे अपयश को सोचकर बार-बार शोक-सा हो रहा है क्योंकि तुम्हारा यह अपयश मुझ अभागे पतित के द्वारा ही होगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 202-203