# किशोरी मोरी, सुनिय नेकु इक बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0187-M04-K036
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 36
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 84–85

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>किशोरी मोरी, सुनिय नेकु इक बात।  
<a id="line-2"></a>हौं मानत हौं परम पातकी, विश्व-विदित विख्यात।  
<a id="line-3"></a>पै यह कौन बात अचरज की, तव चरनन विलगात।  
<a id="line-4"></a>कोउ इक मोहिं बताउ तुमहिं तजि, बिनु पातक जग जात।  
<a id="line-5"></a>जेहि दरबार कृपा बिनु कारन, बटत रही दिन रात।  
<a id="line-6"></a>तेहि दरबार भयो अब टोटो, यह अचरज दरसात।  
<a id="line-7"></a>मोहिं “कृपालु” कछु आपुन सोच न, तोहिं सोचि पछितात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे वृन्दावन विहारिणी राधिके! मैं आपसे एक छोटी सी बात कहना चाहता हूँ, कृपया बुरा न मानते हुए सुन लीजिए। मैं स्वयं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैं समस्त संसार में प्रख्यात एवं सर्वश्रेष्ठ पापात्मा हूँ, पर साथ ही यह भी कहना चाहता हूँ कि तुम्हारे चरण-कमलों से विमुख होने के कारण हूँ इसमें आश्चर्य हीं क्या है? अनादि काल से लेकर आज तक के इतिहास में मुझे किसी एक जीव का भी नाम बता दीजिए जो तुमसे विमुख हीकर भी बिना पाप के संसार में हुआ हो। आश्चर्य तो यह है कि जिस दरबार में बिना कारण ही निरन्तर कृपा का वितरण हुआ करता था, आज उसी दरबार में मुझ पतित के लिए कृपणता की जा रही है। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे अपनी तो कोई भी चिंता नहीं, किन्तु तुम्हारे अपयश को सोचकर बार-बार शोक-सा हो रहा है क्योंकि तुम्हारा यह अपयश मुझ अभागे पतित के द्वारा ही होगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 202-203

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
