लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 38

कौन हरि! हमरो तुम्हरो नात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kauna hari! hamaro tumharo nāta?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कौन हरि! हमरो तुम्हरो नात।

2तुम सोवत निज लोक चैन ते, हम रोवत दिन रात।

3हम पल छिन तुम बिन नित तलफत, तुम नहिं पूछत बात।

4नैन निगोरे बरजत मोरे, और और अकुलात।

5रोम रोम नित याचत मोते, सुंदर श्यामल गात।

6जानि “कृपालु” कृपालु तोहिं हौं, प्रीति करी पछितात॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! हमारा-तुम्हारा नाता ही क्या समझा जाय, जब कि तुम अपने गोलोक में चैन से सो रहे हो और हम तुम्हारे लिए निरन्तर रो रहे हैं। हम सदा एक-एक क्षण तुम्हारे मधुर-मिलन के लिए तड्पते रहते हैं फिर भी तुम बात नहीं पूछते। इन हठीले नेत्रों को मैं जितना अधिक समझाता हूँ उतने ही यह और व्याकुल होते हैं। कहाँ तक कहें, प्रत्येक रोम-रोम मुझ से सलोने श्यामसुन्दर को माँगता है। 'कृपालु' कहते हैं कि मैंने तुम से, कृपा करने वाला समझकर, प्रेम किया था किन्तु अब तुम्हारी निष्ठुरता को देखकर मन ही मन पछता रहा हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 203-204