लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 14

अहो हरि! सोचहु पाछिल बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! sochahu pāchhila bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अहो हरि! सोचहु पाछिल बात।

2विरद पतितपावन लहि पतितन, भयो जगत विख्यात।

3हौं पतितन सरदार तदपि तुम, भूलि गये सो नात।

4मोहिं अपुनो कछु सोच न नेकहुँ, तुमहिं सोचि पछितात।

5इक हमरे कारन करुनामय, तुम्हरो विरद नसात।

6मुक्ति “कृपालु” न चह, चह बंधन, अलि बनि पद-जलजात॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! पतितों की पिछली बातों का स्मरण कोजिए। पतितों के द्वारा ही "पतित पावन'को उपाधि प्राप्त करके तुम संसार में प्रसिद्ध हुए हो। हम उन्हीं पतितों के सरदार हैं, फिर भी तुम पतितों की कृतज्ञता भूल गये हो। मुझे अपनी कुछ भी चिंता नहीं है में तो तुम्हारे विरद को सोच-सोचकर मरा जा रहा हूँ। हे करुणा के भण्डार! एक हमारे ही कारण तुम्हारा यह पतितपावन नाम नष्ट होना चाहता है। 'कृपालु' कहते हैं कि मेरे कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि मैं केवल इन पापों से ही छुटकारा पाकर मुक्ति पद चाहता हूँ, वरन् मैं तो तुम्हारे युगल चरण कमलों का भौंरा बनकर अनंतकाल के लिए बन्धन ही चाहता हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 184-185