दैन्य-माधुरी · पद 13
अहो हरि! बेर भई रिरियात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! bera bhaī ririyāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो हरि! बेर भई रिरियात।
2तुम व्यापक पुनि अंतर्यामी, पुनि कत नाहिं सुनात।
3निगमागम पुरान यद्यपि हौं, पढ़त, सुनत दिन रात।
4तदपि नाथ यह मन मनमानी, करत न नेकु अघात।
5यद्यपि बार बार हौं बरजत, समुझावत बहुभाँत।
6तदपि “कृपालु” कृपा बिनु तुम्हरी, बिगरी बनि न सकात॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! कृपा की भिक्षा माँगते-माँगते अनन्त जन्म बीत गये। तुम सर्वव्यापक हो, फिर अन्तर्यामी भी हो फिर भी मेरी पुकार क्यों नहीं सुनते? यद्यपि शास्त्रों-वेदों एवं पुराणों को दिन-रात पढ़ता एवं सुनता हुँ; फिर भी, हे नाथ! यह मन अपनी मनमानी नहीं छोड़ता। यद्यपि मैं बारबार रोकता हूँ एवं अनेक प्रकार से समझाता हूँ, 'कृपालु' कहते हैं, फिर भी तुम्हारी कृपा के बिना हमारी बिगड़ी नहीं बन सकती।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 184