दैन्य-माधुरी · पद 12
अहो हरि! देहु मोहिं विरहाग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! dehu mohiṁ virahāga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो हरि! देहु मोहिं विरहाग।
2जीवनमुक्त परमहंसहुँ जेहि, पाय मान बड़भाग।
3पंचकोष जरिजात आपु जिमि, अशन जरत जठराग।
4प्रक्षालत बरसाय दृगन जल, पापपंक उर लाग।
5जरत त्रिताप आप विरहागिनि, पंच क्लेशहूँ भाग।
6कब “कृपालु” लहि विरह दुसह दुख, करिहौं अमर सुहाग॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! मुझे अपने वियोग का दुःख दे दो। जिस दुःखाग्नि को बड़े-बड़े जीवन्मुक्त परमहँस भी पाकर अपने आप को भूरि-भाग्यशाली मानते हैं। जिस विरहाग्नि में पंचकोश अपने आप उसी प्रकार जल जाते हैं जिस प्रकार खाया हुआ पदार्थ पेट में जठराग्नि से जल जाता है। उस विरहाग्नि के द्वारा आँखों के आँसू समस्त पापों को धो देते हैं। उस विरहाग्नि से दैहिक, दैविक, भौतिक ताप भी जल जाते हैं, एवं राग द्रेष आदि पंचक्लेश भी सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे कब माधुर्य-भाव का विरह-दुःख मिलेगा?? जिसको पाकर मैं सदा के लिए सुहागिन बन जाऊँगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 183-184