दैन्य-माधुरी · पद 11
अहो हरि! तुम मम साहूकार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! tuma mama sāhūkāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो हरि! तुम मम साहूकार।
2तुम्हरे ऋणहिं उऋण नहिं होइ सक, अगनित जनम मझार।
3करि करुणा करुणावरुणालय, नर तनु दिय सरकार।
4पुनि निज वेदन मार्ग बतायो, कीनो मम उपकार।
5पुनि समुझायेहु संत अनंतन, लै पुनि पुनि अवतार।
6कह “कृपालु” मन तबहुँ सुन्यो नहिं, तुम ही सुनहु पुकार॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम मेरे साहूकार हो और मैं तुम्हारा कर्जदार हूँ। तुम्हारे अकारण उपकारों के ऋण से मैं अनन्त जन्मों में भी उऋण नहीं हो सकता। हे करुणा-वरुणालय! तुमने अकारण करुणा के ही परिणाम-स्वरूप मनुष्य शरीर दिया, फिर स्वयं वेदों को प्रकट करके अपनी प्राप्ति का मार्ग दर्शन किया, फिर अनन्तानन्त संतों को अवतार दिला कर मुझे बार-बार जगाया। 'कृपालु' कहते हैं तब भी इस नीच मन ने मेरी नहीं सुनी। हे श्यामसुन्दर!
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 182-183