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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 10

अहो हरि! कहौं कौन पै जाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! kahauṁ kauna pai jāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अहो हरि! कहौं कौन पै जाय।

2सुनत पुरानन कान स्वर्ग कहुँ, जहँ वैभव बहुताय।

3पै तहँ वेद विधान कठिन पुनि, छीन पुन्य जग आय।

4पुत्र कलत्र मित्र स्वारथ रत, पुनि रंकन को राय।

5हौं अज्ञानी, मुक्ति ज्ञान ते, पुनि मोहिं सो न सुहाय।

6तुम ही सों “कृपालु” हौं कहिहौं, औरन कहे बलाय॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम्हारे सिवाय और कौन है जो हमारी दीन पुकार सुन सकेगा? शास्त्रों-वेदों के द्वारा सुनते हैं कि स्वर्ग में महान् वैभव है, किन्तु तन्निमित्त कर्मों में बड़े-बड़े विधानों को अपेक्षा है, फिर पुण्य-क्षीण होने पर कूकर-शूकर आदि योनियों में जाना पड़ता है। स्त्री, पुत्र, मित्रादि घोर स्वार्थी हैं और फिर स्वयं भिक्षुक हैं। सुनते हैं ज्ञान से मुक्ति हो जाती है, किन्तु हम तो अज्ञानी हैं, और फिर मुझे स्वप्न में भी मुक्ति अच्छी नहीं लगती। 'कृपालु' कहते हैं-हम तो तुम्हारे द्वार पर धरना दिये बैठे हैं, केवल तुम्हीं से अनन्त-काल तक माँगने का निश्चय कर रखा है। अन्य लोगों से, वे चाहे स्वर्गीय देवता ही क्यों न हों, मैं भूलकर भी नहीं माँग सकता।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 182