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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 9

अहो हरि! कब लौं रहिहौं दूरि।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! kaba lauṁ rahihau dūri?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अहो हरि! कब लौं रहिहौं दूरि।

2कबै निरखिहौं नव जलधर तनु, इन नैनन भरपूरि।

3यदपि कलप कलपांतर ही सोँ, कीन्यो पातक भूरि।

4तदपि नाथ! यह हिय प्रतीति तुम, मेरे जीवन मूरि।

5कबै सुरति करिहौ हमरीहूँ, जानि दास-पगधूरि।

6क्यों “कृपालु” अब लौं नहिं आये?, का हिय रहे बिसूरि॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम कब तक अपने-स्वरूप-दर्शन माधुरी से बंचित रखोगे। वह दिन कब आयेगा, जब मैं आपके नवीन मेघ की कान्ति के समान चिन्मय स्वरूप का भली भाँति इन आँखों से, जी भर कर दर्शन करूँगा। यद्यपि मैंने अनंतानंत कल्यों से ही अनंतानंत पाप किये हैं, तथापि हे नाथ! हृदय में यह पूर्ण विश्वास है कि तुम्हीं एकमात्र पतितों व जीवन के सर्वस्व हो। वह दिन कब आयेगा, जब आप मुझे अपने भक्तों की चरण धूलि समझकर मेरा स्मरण करोगे। कृपालु' कहते हैं कि हे नाथ!! तुम पतित पावन होते हुए भी अब तक क्यों नहीं आये अब किस सोच में पड़े हो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 181