दैन्य-माधुरी · पद 8
अहो हरि! कब ते द्वार खड़ो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! kaba te dwāra khad̤o
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो हरि! कब ते द्वार खड़ो।
2मांगत भीख कृपा की सिर धरि, कोटिन पाप घड़ो।
3यद्यपि लखि निज ओर दयामय, लाजन जात गड़ो।
4तदपि तिहारो विरद सोचि जिय, साहस कछुक पड़ो।
5रसिकन सुनि बिनु हेतु सनेही, हौं रिरियात अड़ो।
6जेतिक पतित “कृपालु” मिले तोहिं, हौं उन माहिं बड़ो॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! एक दीन-भिखारी तुम्हारे द्वार पर बड़ी देर से खड़ा-खड़ा कृपा की भीख माँग रहा है। साथ ही अपने सिर पर करोड़ों महापापों का घड़ा भी रखे हुए है। हे दया के सागर! यद्यपि जब मैं अपने पापों की ओर देखता हूँ तो लज्जा के कारण पृथ्वी में गड़ा-सा जाता हूँ तथापि जब तुम्हारे 'अकारण करुण'इस विरद पर विचार करता हूँ, तो कुछ साहस अवश्य हो जाता है। महापुरुषों के मुख से सुना है कि तुम बिना कारण ही प्रेम करते हो, इसी विश्वास पर गिड़गिड़ाता हुआ हठपूर्वक तुम्हारे द्वार पर अड़ा हुआ हूँ। कृपालु' कहते हैं कि तुम्हें आज तक जितने भी पापी मिले हैं, मैं उन सबमें महान् हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 180-181