दैन्य-माधुरी · पद 7
अहो हरि! ओहू दिन कब ऐहैं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! ohū dina kaba aihaiṁ?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो हरि! ओहू दिन कब ऐहैं।
2गावत गुन गोपाल निरंतर, दृगन अश्रु बरसैहैं।
3रूप माधुरी निशिदिन ध्यावत, मन भृंगी बनि जैहैं।
4बाट निहारि तिहारी पल पल, कलप समान जनैहैं।
5हाय! हाय! करि इत उत भाजत, निज तनु सुधि बिसरैहैं।
6यह “कृपालु” जिय परम भरोसो, कबहुँ तो हरि अपनैहैं॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! वह दिन कब आवेगा, जब आपके गुणों को गाते हुए प्रतिक्षण मेरी आँखें आँसू बहायेंगी। मेरा मन आपके चिन्मय स्वरूप का प्रतिक्षण चिन्तन करता हुआ भृंगी कीड़े की तरह कब तन्मय हो जायगा। कब आपके दर्शनों की प्रतिक्षण प्रतीक्षा में मुझे एक-एक क्षण कल्प-कल्पान्तरों के समान लगेगा। 'हा नाथ! हा श्यामसुन्दर! इस प्रकार कहते हुए, परम व्याकुलता-वश इधर-उधर भागते हुए, मैं कब पागल की भाँति अपनी सुधि-बुधि भूल जाऊँगा। 'कृपालु के हृदय में यह पूर्ण विश्वास है कि कभी न कभी तो नाथ इस दास को अवश्य अपनायेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 179-180