दैन्य-माधुरी · पद 6
अहो हरि! अब हौं गयों अघाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! aba hauṁ gayoṁ aghāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो हरि! अब हौं गयों अघाय।
2पचि पचि मरेउँ अनादि काल ते, जड़ जंगम भरमाय।
3अब जानी नहिं चल मनमानी, रसिकन दीन बताय।
4ज्यों कोउ खग जलयान त्यागि नभ, कब लौं सकत उड़ाय।
5त्यों बिनु पद अवलंब तिहारे, मन विश्राम न पाय।
6पियत मृगन मृगजल ज्यों नेकहुँ, सकत न प्यास बुझाय।
7त्यों “कृपालु” बिनु पिये प्रेमरस, किमि मन चैन लखाय॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! अब संसार से मेरा पेट भली-भाँति भर चुका। अनादि काल से स्थावर, जंगम चौरासी लाख योनियों में अज्ञानतावश व्यर्थ ही अब तक पच-पचकर मरता रहा। अब मन की मनमानी नहीं चल सकती, क्योंकि महापुरुषों ने इस मार्मिक रहस्य को पूर्णतः बता दिया है कि हम जहाँ भटक रहे हैं वहाँ विश्राम नहीं है। जैसे किसी जहाज पर बैठा हुआ पक्षी आकाश में अधिक देर तक नहीं उड़ सकता, अन्त में उसे हारकर जहाज की ही शरण लेनी होती है, उसी प्रकार आपके चरण-कमलों के जहाज का अवलम्ब लेने वाला जीव अन्यत्र कहीं भी एक क्षण को भी चैन नहीं पा सकता। जिस प्रकार मरुस्थल के मिथ्या मृगजल-पान से हिरन की किंचित् भी प्यास नहीं बुझती, उसी प्रकार, 'कृपालु' कहते हैं कि बिना विशुद्ध उज्ज्वल, निष्काम प्रेम रस पान किये, सांसारिक विषय-रूपी मृगजल-पान से थोड़ी भी शांति का अनुभव नहीं हो सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 178-179