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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 5

अहो हरि! अब तो सह्यो न जाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! aba to sahyo na jāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अहो हरि! अब तो सह्यो न जाय।

2हौं रहि"अग जग"जहँ लगि जग कह, पलहूँ कल नहिं पाय।

3तपत त्रितापन आपन पापन, अब हौं गयों अघाय।

4अशरण-शरण शरण चरणन अब, आयो जनि ठुकराय।

5जानि बानि निज कान्ह कान करि, लेहु मोहिं अपनाय।

6माँगत भीख “कृपालु” सीख नहिं, अब जनि बेर लगाय॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! स्थावर जंगम-रूप, जहाँ तक यह मायिक संसार है, मैंने सर्वत्र रहकर देख लिया तथा यह भी समझ लिया कि इस संसार में कहीं एक क्षण के लिये भी चैन नहीं है। अपने ही किये हुए अनंतानंत पापों के परिणाम स्वरूप दैहिक, दैविक, भौतिक तापों में तपता हुआ अब मैं छक गया हूँ, अब यह दुःख सहा नहीं जाता। हे अशरण शरण! यही सब सोचकर अब मैं तुम्हारे युगल-चरणों की शरण आ गया हूँ, मुझे ठुकरा मत देना। हे श्यामसुन्दर! अपने विरद को विचारते हुए मुझे सदा के लिए अपना बना लीजिए। कृपालु' कहते हैं कि मैं आप से उपरोक्त भिक्षा चाहता हूँ साधन करो'आदि का उपदेश नहीं चाहता। हे नाथ!! अब देर न लगाइए।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 178