दैन्य-माधुरी · पद 4
अहो पिय! जब तुम्हरी बनि जैहौं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho piya! jaba tumharī bani jaihauṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो पिय! जब तुम्हरी बनि जैहौं।
2तव मुखचंद्र, चकोर पियत नित, दृगन न नेकु अघैहौं।
3ह्वै तुम्हरी अपनो करि तुम को, तन मन प्राण लुटैहौं।।
4तव कर परस पाय मदमाती, फूली अँग न समैहौं।
5नचिहौं बनि उनमादिनि छिन छिन, तुम्हरोइ गुनगन गैहौं।
6मन भाई “कृपालु” करि भुज भरि, पुनि पुनि कंठ लगैहौं॥
हिन्दी भावार्थ
हे प्रियतम श्यामसुन्दर! मैं जब तुम्हारी बन जाऊँगी तब तुम्हारे मुख चन्द्र की रूप माधुरी को निरन्तर पीते हुए भी आ नेत्र रूपी चकोर थोड़ा भी तृप्त न होंगे वरन् बार-बार दर्शनों की अभिलाषा बढ़ती ही जायगी। तुम्हारी बनकर एवं तुमको अपना बनाकर, तुम्हारे ही ऊपर आनन्द विभोर होकर अपना तन, मन, प्राण सर्वस्व लुटा दूँगी। तुम्हारे कोमल कर कमलों के मधुर स्पर्श को पाकर मतवाली हो जाऊँगी और उन्मत्त होकर तुम्हारे गुणगान गाती हुई क्षण-क्षण में बार-बार नाचा करूँगी। 'कृपालु' कहते हैं कि फिर मैं भली-भाँति अपनी मनभाई करूँगी एवं सवीग आलिंगन पूर्वक बार-बार तुम्हें अपने गले लगाऊँगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 177