दैन्य-माधुरी · पद 3
अशरण-शरण शरण तव आयो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: asharaṇa-sharaṇa! sharaṇa tava āyo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अशरण-शरण शरण तव आयो।
2भटकत रह्यों अनादि काल ते,
3ज्यों अनाथ जग अग जग जायो।
4तजि तव चरणकमल कहुँ नेकहुँ,
5एकहुँ पल कहँ कल नहिं पायो।
6गयो हारि जब दीन जानि मोहिं,
7रसिक जनन यह मरम बतायो।
8भुक्ति मुक्ति -सुख भार डारि अब,
9बनि मधुकर चरनन लिपटायो।
10जब “कृपालु” ह्वै गयो तिहारो,
11काल कर्म गुन सब खिसियायो॥
हिन्दी भावार्थ
हे अशरण शरण श्यामसुन्दर! अब मैं तुम्हारी शरण में आ गया हूँ। अनादिकाल से आज तक अनाथ की भाँति चराचरात्मक इस संसार में बार-बार पैदा होकर सदा भटकता रहा। तुम्हारे परमानंदमय युगल चरणों का परित्याग करके कहीं एक क्षण को भी थोड़ा भी चैन नहीं पाया। जब सब प्रकार से हार गया तब महापुरुषों ने मुझे दीन समझकर 'आपकी शरण में ही चैन है'यह रहस्य बताया। संसार के सुख एवं मुक्ति के सुख का भी सर्वथा परित्याग करके अब मैं आपके चरण कमलों में भौंरा बनकर लिपट गया हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं जब से तुम्हारी शरण में आकर तुम्हारा बन गया हूँ तब से काल, कर्म एवं तीनों गुण सब खिसियाकर हाथ मींज रहे हैं अर्थात् काल, कर्म, गुण इन सबका कुछ भी वश नहीं चलता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 176-177