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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 2

अपनी ओर टुक हेरो री, किशोरी राधे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: apanī ora ṭuka hero rī, kishorī rādhe

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अपनी ओर टुक हेरो री, किशोरी राधे।

2हौं तो कुटिल नीच सब दिन को,

3विश्व विदित अघ मेरो री किशोरी राधे!

4पै"बिनु हेतु पतितपावनि"यह,

5विरद दुर्यो कित तेरो री किशोरी राधे!

6शिशु नवजात न जानत मातहिं,

7रहत मातु रुचि चेरो री किशोरी राधे!

8त्यों हौं अति अबोध जड़ पामर,

9महामोह तम घेरो री किशोरी राधे!

10हमरिहिं बेर बेर कत एतिक,

11याको करिय निबेरो री किशोरी राधे!

12जगहुँ सुनात “कृपालु” कुमात न,

13यदपि कुपूत घनेरो री किशोरी राधे!

हिन्दी भावार्थ

हे बरसाने वाली राधे! हमारी ओर न देखकर केवल अपनी ओर देखिए। मैं तो अनादि-कालसे ही आपको भूलकर अत्यन्त ही कुटिल एवं नीच बन चुका हूँ, तथा मेरे पापों को भी सारा संसार जानता है। किन्तु "बिना कारण ही महान्-से महान् पतितों को पवित्र करनेवाली 'तुम्हारी इस प्रतिज्ञा का क्या होगा? मुझे इसका विचार है। जिस प्रकार नवजात बालक अपनी माता को पहिचान नहीं सकता, माता ही स्वभावतः उसकी इच्छाओं को पूर्ण करती है। उसी प्रकार मैं भी तो अत्यन्त अनजान, हठी एवं दुष्ट तुम्हारा ही बालक तो हूँ, जो अत्यन्त भयावह अज्ञान के अँधेरे में पड़ा हूँ। आपने किसी भी पतित के लिए इतनी देर नहीं की, फिर हमारे लिए इतनी देर क्यों कर रही हो, इसका विचार कीजिए। 'कृपालु' कहते हैं कि संसार में कुपुत्र कितने ही हो जाएँ, किन्तु कुमाता एक भी नहीं सुनाई पड़ती, बस इससे अधिक मुझे कुछ नहीं कहना है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 175-176