दैन्य-माधुरी · पद 1
अगति के गति तुम दीनदयाल!
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: agati ke gati tuma dīnadayāla!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अगति के गति तुम दीनदयाल!
2जग सब बने बने के साथी, पति वनिता पितु बाल।
3पै तुम कूबरि कहँ सुंदरि करि, किय निहाल तत्काल।
4लै द्वै मूठि सुदामहिं कन किय, दै द्वै लोक निहाल।
5उन पाण्डव वनवासिन कहँ तुम, दियो साथ गोपाल।
6दिय “कृपालु” गति-मातु पूतनहिं, तुम सम कौन कृपाल॥
हिन्दी भावार्थ
हे दीनों पर दया करने वाले श्यामसुन्दर! के तुम्हीं आधार हो। जगत् के माता, पिता, स्त्री, पति, बच्चे आदि सब तो बने-बने के ही साथी हैं, किन्तु तुमने तो कुबरी कहते हैं कहाँ तक कहें? भी अपनी माता के समान गोलोक दान कर दिया। समान कृपालु और कौन हो सकता है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 174