सिद्धान्त-माधुरी · पद 142
होति जग इक अनहोनी बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hoti jaga ika anahonī bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1होति जग इक अनहोनी बात।
2जो नहिं होइ सक तीनि काल महँ, सोइ जग हो दिन रात।
3रसिकन कह सिगरो जग दुलहिनि, दूलह श्यामल गात।
4दूलह रस बिनु नीरस दुलहिनि, रस नहिं पाय सकात।
5पै जग लखु सब दुलहिनि दुलहिनि, दुलहिनि की बनि जात।
6जो “कृपालु” यह जान मरम सो, जोरत हरि सोँ नात॥
हिन्दी भावार्थ
संसार में एक ऐसी अनहोनी बात है जो सदा होती रहती है। वस्तुतः जो त्रिकाल में भी असम्भव है, वही बात दिन-रात हो, यह कितना बड़ा आश्चर्य है। रसिकजन कहते हैं-समस्त जीवात्माएँ परमात्मा श्यामसुन्दर की दुलहिन-स्वरूपा हैं। यह सर्वविदित है कि दूलह श्यामसुन्दर दिव्य रस का भंडार हैं एवं दुलहिन जीवात्मा अनादि काल से मायाधीन होने के कारण आनंद-रस से वंचित है। अतएव सिद्ध हुआ कि बिना श्यामसुन्दर-रूपी प्रियतम को प्राप्ति के जीवात्मा-रूपी दुलहिन स्वप्न में भी आनन्द प्राप्ति नहीं कर सकती। किन्तु संसार का आश्चर्यमय कार्य देखो। एक दुलहिन जीवात्मा दूसरी दुलहिन जीवात्मा की दुलहिन बन जाती है। 'कृपालु' कहते हैं जो इस रहस्य को जान लेता है वह तत्काल मायिक संसार से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में अनुरक्त हो जाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 171-172